
*जमीन विवाद से शुरू हुआ मामला पहुंचा सियासी गलियारों तक, जिलाध्यक्ष ब्रजेश गौतम और जफर अमीन डक्कू के बीच बढ़ी दूरी ने बढ़ाई मुश्किलें*
*छोटे से विवाद के संगीन मुकदमे तक पहुंचने पर उठे सवाल, कार्यकर्ताओं में चर्चा का दौर*
*दो प्रमुख नेताओं की गैरमौजूदगी से पार्टी के आंदोलन और जनमुद्दों की सक्रियता पर असर पड़ने की चर्चा*
*अंदरूनी मतभेद सुलझाने के लिए वरिष्ठ नेताओं की मध्यस्थता की मांग, वरना चुनावी तैयारियों पर पड़ सकता है असर*
गोरखपुर। समाजवादी पार्टी में जमीन विवाद से शुरू हुआ घटनाक्रम अब पार्टी के भीतर की सियासी खींचतान का मुद्दा बनता दिखाई दे रहा है। वरिष्ठ नेता जफर अमीन डक्कू की गिरफ्तारी और महानगर अध्यक्ष शब्बीर कुरैशी की गैरमौजूदगी को लेकर सपा कार्यकर्ताओं और राजनीतिक हलकों में तरह-तरह की चर्चाएं हैं। वहीं डक्कू और जिलाध्यक्ष ब्रजेश कुमार गौतम के बीच बढ़ी दूरी ने पार्टी के अंदर असमंजस की स्थिति और गहरी कर दी है।
जफर अमीन डक्कू की गिरफ्तारी के बाद जिस तरह मामला चर्चा में आया है, उससे यह सवाल भी उठ रहा है कि आखिर एक जमीन विवाद का मामला इतनी दूर तक कैसे पहुंच गया। हालांकि पूरे मामले में पुलिस और संबंधित पक्षों की अपनी-अपनी दलीलें हैं, लेकिन स्थानीय स्तर पर कार्रवाई को लेकर सवाल उठाने वालों की भी कमी नहीं है। कुछ लोगों का कहना है कि मामले में सभी पक्षों को सुनकर कार्रवाई की जाती तो शायद विवाद इस स्तर तक नहीं पहुंचता। वहीं कानून-व्यवस्था के नजरिए से पुलिस की कार्रवाई को भी अपने स्तर पर देखा जा रहा है।
इस मामले ने राजनीतिक रंग ले लिया, जब डक्कू और पार्टी जिलाध्यक्ष ब्रजेश कुमार गौतम के बीच कथित तौर पर दूरियां बढ़ने की चर्चा सामने आई। दोनों नेताओं के बीच मतभेद को लेकर कार्यकर्ताओं में भी बेचैनी है। पार्टी के भीतर यह सवाल उठ रहा है कि ऐसे समय में जब संगठन को एकजुट होकर जनता के मुद्दों को लेकर सक्रिय रहना चाहिए, तब शीर्ष स्थानीय नेताओं के बीच बढ़ती दूरी पार्टी के लिए किस तरह का संदेश दे रही है।
दूसरी ओर महानगर अध्यक्ष शब्बीर कुरैशी की गैरमौजूदगी को लेकर भी सियासी हलकों में चर्चा तेज है। पार्टी के कई कार्यकर्ताओं का मानना है कि दो प्रमुख चेहरों की अनुपस्थिति का असर संगठनात्मक गतिविधियों पर पड़ना स्वाभाविक है। आंदोलन और जनहित के मुद्दों पर पार्टी की सक्रियता को लेकर भी कार्यकर्ताओं के बीच सवाल उठ रहे हैं।
राजनीतिक जानकारों की नजर अब इस बात पर है कि डक्कू को कानूनी राहत कब मिलती है और शब्बीर कुरैशी कब सार्वजनिक रूप से सक्रिय होते हैं। इसके साथ ही यह भी महत्वपूर्ण होगा कि पार्टी नेतृत्व डक्कू और जिलाध्यक्ष के बीच बढ़े मतभेद को किस तरह से सुलझाता है।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आपसी मतभेदों को भुलाकर एक मंच पर आएंगे? क्योंकि मामला केवल दो नेताओं के बीच की तनातनी तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसका असर संगठन, कार्यकर्ताओं के मनोबल और आने वाले राजनीतिक कार्यक्रमों पर भी पड़ सकता है। ऐसे में पार्टी के भीतर समझ-बूझ रखने वाले वरिष्ठ नेताओं की मध्यस्थता और समय रहते समाधान की पहल को अहम माना जा रहा है।











